कुछ अलग करने की चाह में मिला नाम “चौबे जी कचरेवाले”…एक सोच को हकीकत की जमीन पर लाने की कहानी

सारिका झा

इंसान जब थोड़ा सजग होता है तो खुद का भार उठाना शुरू करता है, और जब वह समाज के लिये सजग होता है तो पूरे समाज के लिये विचार करता है।  उन्हीं विचारकों में से एक हैं, गिरिजेश चौबे, जिन्हें चौबेजी कचरेवाले के नाम से भी जाना जाता है।

गिरिजेश चौबे के चौबे जी कचरेवाले बनने के पीछे एक ऐसी सोच है जो समाज के लिये कुछ कर गुजरने के लिये बनी थी।

एक अच्छी नौकरी, अच्छा वेतन, मान-सम्मान सब कुछ था, मगर दिल में एक कमी सी खलती थी। गिरिजेश समाज के लिये कुछ ऐसा करना चाहते थे, जो सबकी भलाई के लिये तो हो ही, हर घर से जुड़ा हो।

इसके लिये दिल ही दिल में सुलभ संस्थापक बिन्देश्वर पाठक प्रेरणा बने, जिनकी नायाब सोच ने उन्हें देश ही नहीं दुनियाँ में एक स्थापित नाम दे दिया था।

गिरिजेश चौबे भी इसी तरह कुछ अलग करना चाहते थे। इसी उधेड़बुन में नौकरी करते हुए उनकी सोच को दिशा मिली।

इसी को जमीन पर उतारते हुए उन्होंने साल 1996 में “पाथेय” यानि “पीपल्स एसोसिएशन फॉर टोटल हेल्प एंड यूथ अप्लाउज” नाम से स्वयंसेवी संगठन की स्थापना की।

इस संगठन ने स्वच्छता एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यों को करना शुरू किया। जिसके अन्तर्गत घर-घर से कचरा संग्रह, उसकी छंटाई, एवं खाद निर्माण किया जाता था।

लेकिन संस्था को पहला काम इसके शुरू के 10 साल बाद 2005 में दिल्ली में राजघाट पर मिला। जहाँ सारे पत्तों को एकत्रित कर उनके निस्तारण का जिम्मा पाथेय को मिला। जिसके लिये उन्हें महीने के 17 हजार रूपये मिलते थे।

सफलता के इसी दौर में वर्ष 2008 में दिल्ली नगर निगम के साथ यमुना कार्य योजना के तहत काम करने के लिये सहयोगी संस्था के रूप में पाथेय का चयन हुआ।

जिसमें पाथेय को यमुना स्वच्छता अभियान के तहत पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके लिये संगठन ने घर-घर से कचरा संग्रह करने के साथ नुक्कड़ नाटकों एवं विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा बच्चों महिलाओं को जागरूक करने के भी काम किये।

सफलता की जो शुरूआत हुई तो 17 हजार महीने की कमाई लगभग डेढ़ करोड़ महीने और सालाना 18 करोड़ में बदल गई। इस संस्था से लगभग 1200 लोग जुड़े हैं जिन्हें यहाँ रोजगार मिला है। पाथेय स्वयंसेवी संगठन अब ग्रुप ऑफ एसोसिएट्स में तब्दील हो गई है।

गिरिजेश चौबे

सोच से सफलता के इस सफर के बारे में गिरिजेश चौबे कहते हैं कि कि जब कचरा प्रबंधन की बात सोची थी तब लोगों को यह बात बहुत पसंद नहीं आई थी।

लोग कचरे के नाम पर रूमाल से अपनी नाक ढ़ंक लेते थे। मगर कचरा हर घर की समस्या थी जिसे दूर करने के लिये काम करने का हमने संकल्प लिया था।

कचरा हमारे लिये कचरा नहीं बल्कि सोना है क्योंकि इससे कम्पोस्ट तो तैयार होता ही है, इसके रीसाईक्लिंग से कई वस्तुओं का निर्माण होता है।

एक तरफ हम समाज की गंदगी तो साफ करते ही हैं, लोगों को इससे रोजगार भी मिल रहा है।

आखिरकार गिरिजेश चौबे को उनकी अलग सोच और समाज से जुड़ने की ललक ने उन्हें चौबेजी कचरेवाले के रूप में अलग नाम दिया, जिसे वह भी गर्व से पुकारते हैं।

पाथेय के बारे में

वर्ष 1996 में “पाथेय” यानि “पीपल्स एसोसिएशन फॉर टोटल हेल्प एंड यूथ अप्लाउज” नाम से स्वयंसेवी संगठन की स्थापना की गई।

दिल्ली स्थित इस संस्था का उद्येश्य उपयुक्त ठोस अवशिष्ट प्रबंधन द्वारा वातावरण को संरक्षित करना है।

इसके लिये अभी तक संस्था ने घरेलू जैविक कचरे से खाद बनाने एवं बायो गैस प्राप्त करने की तकनीक का सफलतापूर्वक इजाद किया है, और इससे आगे बढ़ते हुए अगला लक्ष्य बायो गैस का सहज भंडारण एवं इसका समुचित प्रयोग सुनिश्चित किया गया है।

संस्था- स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, महिला सशक्तिकरण, कौशल विकास, स्वच्छता प्रबंधन, पर्यावरण एवं आपदा प्रबंधन से जुड़ी विभिन्न कार्यों को करने में जुटी है। इसकी गतिविधियाँ दिल्ली, उत्तर प्रदेश बिहार, झारखंड, हरियाणा व छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में हैं।

पाथेय के अन्तर्गत ठोस अवशिष्ट प्रबंधन की बात करें तो इसके जरिये जैविक कचरे से 45-60 दिनों में वैज्ञानिक तरीके से खाद का उत्पादन सुनिश्चित किया जाता है।

इससे तैयार खाद किफाइती, सुरक्षित और निर्गंध है।

इस पुनर्चक्रीय कचरे के पुनर्चक्रण से समाज को अतिरिक्त आय की प्राप्ति होती है, और इस कार्यक्रम को बड़े पैमाने पर चलाया जा सकता है, जिससे देश में बढ़ती कचरे की समस्या से भी निजात मिल सकती है।    

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